"चंचल-चंद्रमुखी चावल से कंकर चुनते नहीं लिखीपरी को नल की लम्बी कतारों में स्वेटर बुनते नहीं लिखी"
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चंचल-चंद्रमुखी चावल से कंकर खोजती,
लिखीपरी, कल्पना में खोई खोई चलती।
नल की लम्बी कतारें भी नहीं रोक पातीं,
स्वेटर की बुनाई में, कहानियाँ बुनती।
दुनिया की बाधाएँ, रुकावटें छोटीं,
उसके हौंसले की चादर बड़ी होती।
हर सूत में उसकी तपन का रंग,
स्वप्नों के धागे में बुनते अनंत।
कतारें लम्बी पर उसका धैर्य अडिग,
सपनों की बुनाई में, वक्त जैसे रुका।
लिखीपरी की मेहनत, उसकी जीत की पहचान,
चंचल-चंद्रमुखी के रूप में मिली नई उड़ान।