एक पागल औरत जिसे गांव वाले हमेशा चिढ़ाते थे उसने एक बच्चे को डूबने से बचाया, पागल औरत एक माँ थी जिसने एक दुर्घटना में नदी में गिरकर अपने बच्चे को खो दिया था
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गाँव की गली में, एक पागल औरत,
हर दिन थी हंसी का पात्र, जीवन कठोरत।
आँखों में उसके, दर्द का सागर,
खोया था जिसने, अपना लाल अनमोल नगर।
लोगों की बातें, तीर से चुभती,
वह अकेली, पर आत्मा थी उसकी दहकती।
फिर एक दिन, नदी में आई लहर,
एक बच्चा डूबा, संघर्ष कर रहा बेअसर।
बिना विचारे, वह कूदी जलधार,
उथल-पुथल में बचा लाई, जीवन का आधार।
गाँव था स्तब्ध, यह चमत्कार था,
उस पागल में माँ का दिल उजागर था।
समझ सके अब लोग, उसकी वेदना,
एक पागल औरत नहीं, वह थी ममत्व की साधना।
जिसने खोया था अपना, उसने किसी और को पाया,
उस दिन पागल औरत नहीं, वह जीवन की देवी कहलाया।