एक पागल महिला की पीड़ा उन गांवों से है जो उस पर पत्थर फेंकते हैं
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उस पागल की पीड़ा, अनगिनत क्षणों में है बसी,
गाँव की गलियों में, पत्थरों से घायल है हँसी।
हर चोट उसकी गहराई में छुपा है एक सागर,
कोमल हृदय से जो सहा, वो दर्द है सागर।
प्रकृति की एक सजीव धारा, फिर भी बनी निशाना,
हर पत्थर की गूंज में वो सुनती, खुद का अफसाना।
आंसुओं में सुलगती आग, आँखों में बुझती एक किरन,
वो पागल, संसार की परछाई में अपनी कहानियाँ बुन।
पत्थरों से भरी सड़क पर, उसका अकेला सफर,
वो पागल नहीं, बल्कि सजीव है, दर्द का एक अम्बर।
गाँव है अनजान, हर पत्थर की गूंज कह रही,
वो चुप, पर उसकी आत्मा चिल्ला रही।