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आतंकवाद का न कोई धर्म, न कोई जात,  
वो लाया है बस एक मकसद साथ।  
मकसद हिन्दुस्तानियों का बनते का,  
हम क्यों लड़ रहे हैं एक-दूजे से, ये बात।  

हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर बंट गए,  
हमारा दुश्मन तो कोई और है भय दे।  
क्यों अब हम भारतवासी न होकर,  
बस हिन्दू या मुसलमान बनकर रह गए?  

कहाँ गया हमारा भाईचारा और एकता,  
जो थी पूरी दुनिया के लिए मिसाल बेहतरीन।  
क्यों हर मुसलमान पाकिस्तानी कहाए,  
जब आतंकवाद का न धर्म, न जात।  

क्यों हम नहीं करते सवाल गरीबी पर,  
महंगाई और बेरोजगारी पर ध्यान कम।  
क्यों हमारी जुबान पर है बस एक नाम,  
हिन्दू-मुसलमान का बिगुल धम।  

आओ मिलकर बदलें यह सोच,  
फैलाएं प्रेम, दूर करें सब दोष।  
भारत को फिर से दिखाएं वो रौशनी,  
जो सहेजती है सबको, न कोई अलगाबाज़ी।

कविता की पृष्ठभूमि बदलें

आतंकवाद का न कोई धर्म, न कोई जात, वो लाया है बस एक मकसद साथ। मकसद हिन्दुस्तानियों का बनते का, हम क्यों लड़ रहे हैं एक-दूजे से, ये बात। हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर बंट गए, हमारा दुश्मन तो कोई और है भय दे। क्यों अब हम भारतवासी न होकर, बस हिन्दू या मुसलमान बनकर रह गए? कहाँ गया हमारा भाईचारा और एकता, जो थी पूरी दुनिया के लिए मिसाल बेहतरीन। क्यों हर मुसलमान पाकिस्तानी कहाए, जब आतंकवाद का न धर्म, न जात। क्यों हम नहीं करते सवाल गरीबी पर, महंगाई और बेरोजगारी पर ध्यान कम। क्यों हमारी जुबान पर है बस एक नाम, हिन्दू-मुसलमान का बिगुल धम। आओ मिलकर बदलें यह सोच, फैलाएं प्रेम, दूर करें सब दोष। भारत को फिर से दिखाएं वो रौशनी, जो सहेजती है सबको, न कोई अलगाबाज़ी।