गुरु का स्थान और उनकी जरूरत, देव तुल्य उनके स्थान, जीवन में उनके असर, पर एक १०–१२ चांदी की कविता
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गुरु का स्थान है वो अनमोल,
जैसे सूरज की पहली किरण की गोल।
देव तुल्य उनका आदर है,
जीवन को जो देते नई राहगुज़र हैं।
ज्ञान के दीप जलाए जो,
अंधेरे में पथ दिखलाए वो।
उनके बिना अधूरा जीवन,
संगीत बिना जैसे मौन वृंदगान।
हर शिष्य के सपनों को उड़ान,
उनसे पाते हैं सच्चा मान।
गुरु की मूरत दीपक समान,
जीवन में करते अमृत वृष्टि अनजान।