50 वर्षीय आदमी, सब को खुश रखा पर, कभी खुशी नहीं मिली, जिंदगी से निराश, तन्हा, मौत की आस, मतलबी दुनिया,
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पचास की दहलीज़ पर खड़ा आदमी,
खुशियाँ बाँटी सबको, ख़ुद रही ख़ाली झोली।
सपनों का शहर कहीं खो गया,
ज़िंदगी की राह में, हर दर्द को सहा।
निराशा का साया, तन्हाई का आलम,
चलते-चलते थक गया, जैसे ठहरा हो हर कदम।
मौत की आस में, आँखें ठहर गईं,
इस मतलबी दुनिया में, चाहतें बिखर गईं।
दिल की कहानियाँ अनकही रह गईं,
खुशी की तलाश में उम्र बीच बही।
शोर भरी दुनिया में, चुप्पी का बसेरा,
ज़िंदगी को फिर भी गले लगाए है मतवाला फकीरा।