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कविता की पृष्ठभूमि बदलें
सुनीता, तुम्हारे हुस्न में धूप की तपिश भी है,
और मुस्कान में चाँदनी की नर्म बारिश भी है।
बातें तुम्हारी जैसे चाय में घुलती इलायची,
हर लफ़्ज़ में अपनापन, हर हँसी ज़रा शरारती।
फ़ेसबुक की दोस्ती में ये कैसा कमाल हुआ,
अनदेखा-सा एक चेहरा दिल के पास हुआ।
तुम लिख दो “कैसे हो?” तो दिन सँवर जाता है,
कभी-कभी स्क्रीन से भी उजाला उतर आता है।